Seva Kendra

तेरापंथ के साथ यह क्षेत्र अपने संस्थापना काल के कुछ दिनों बाद से ही जुड़ गया था। जो साधु-साध्वियां बीकानेर-देशनोक चातुर्मास करने के लिए इस संभाग में आते थे, वे कुछ समय तक यहां भी प्रवास करते थे। परिपार्श्व के गांवों के ओसवाल परिवार, जो गंगाशहर में बसने के लिए आते उनसे वे घंटों-घंटों बातचीत करते और तत्व समझाकर उन्हें सम्यक्त्व -दीक्षा प्रदान करते।कठिनाइयों को झेलते हुए भी उनके छोटे-छोटे गांवों में जाकर संबोध देते। इस बुनियादी कार्य में मुनिश्री फौजमलजी (242 ) तथा साध्वीश्री गंगाजी (444 ) का सुनियोजित प्रयत्न सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

उनके गंगाशहर आने से पर  भोजन, पानी, मकान आदि की विभिन्न कार्य में श्रावक भैंरुदानजी चौपड़ा का योगदान भी  महत्वपूर्ण रहा।  उन्होंने अपने अनुज तेजमालजी को ओसवाल परिवारों को गंगाशहर में लाने और उन्हें धार्मिक संबोध देने के लिए विशेष रुप  से नियुक्त किया। बाहर से आने वाले परिवारों के बसने की दृष्टि से वे प्राथमिक पूरी व्यवस्था जुटाते । हर परिवार में अर्थाजन करने में सक्षम व्यक्ति को अपने कलकत्ता स्थित व्यावसायिक प्रतिष्ठान में भेज देते, जबकि बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था गंगाशहर में ही की जाती।  सामाजिक स्तर पर उनका यह सामयिक सहयोग गंगाशहर में बसने वाले सैकड़ों-सैकड़ों परिवारों के तेरापंथ-समाज से जुड़ने में परोक्ष रूप से बड़ा निमित्त बना

वैसे यहां सर्वप्रथम चातुर्मास वि.सं. 1967 में मुनिश्री आनंदरामजी ने किया। क्षेत्र में तत्वज्ञान और सुसंस्कारों के वपन की दृष्टि से मुनिश्री पृथ्वीराजजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका चवदह वर्ष का स्थिरवास इस दृष्टि से बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। अष्टमाचार्य कालूगणी ने वि.सं. 1983 और 1987  के दो चातुर्मासों का प्रसाद प्रदान किया। नवमाधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी ने वि.सं. 1994 , 2000 , 2028  एवं 2038  के मर्यादा-महोत्सव तथा वि.सं. 2000  और 2035  के चातुर्मास. प्रदान कर इस धरती का गौरव बढ़ाया है। इसके अतिरिक्त आचार्यश्री तुलसी की  शासना के उपलब्धि-भरे पचीस वर्षों की परिसंपन्नता पर समायो जित 'धवल समारोह' का द्वितीय एवं मुख्य आयोजन 1  मार्च 1962 इसी धरती पर संपन्न हुआ। इस अवसर पर आचार्यश्री का सार्वजनिक अभिनंदन करते हुए भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन् ने में देश के शीर्षस्थ राजनेताओं, समाजसेवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों की उपस्थिति ने एक बृहत्काय अभिनंदन-ग्रंथ उन्हें समर्पित किया। उस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बन यह धरती भी अपने-आप में ऐतिहासिक बन गई। साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा चयन सन 14  जनवरी 1972  , मुनिश्री  नथमल का  महाप्रज्ञ नामकरण 12 नवम्बर 1978  ,  आचार्य श्री तुलसी महाप्रयाण 23 जून 1997 ,  युवाचार्य  महाश्रमण मनोनयन 14 सितम्बर 1997 में इस गंगाशहर की धरती पर होने का गौरव प्राप्त हुआ है।

Gyaan Shala

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में चलने वाली ज्ञानशाला एक सुन्दर उपक्रम है। ज्ञानशाला एक निर्माणशाला, संस्कारशाला एवं धर्म की पाठशाला है। कितने बच्चे ही ज्ञानार्थी के रूप में ज्ञानशाला से जुड़े हैं। एक समाज के लिए यह आवश्यक होता है कि उसके बच्चों में अच्छे संस्कार और धार्मिक ज्ञान का सृजन हो। जिस समाज के बच्चों में अच्छे संस्कार होते हैं, वही समाज अच्छा बन सकता है और उसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।

ज्ञानशाला तेरापंथ समाज की मूल (जड़) को सिंचन देने वाली है। तेरापंथी महासभा के तत्वावधान में स्थानीय सभाओं द्वारा संचालित ऐसा उपक्रम हैं जिनके माध्यम से भावी पीढ़ी को आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ उसके संस्कारों के विकास का प्रयास किया जाता है। ज्ञानार्थियों, प्रशिक्षकों और व्यवस्थापकों का संतुलन होना चाहिए। बच्चों की चेतना निर्मल हो, उनमें संस्कारों का अच्छा विकास हो ऐसा प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा ज्ञानशाला धर्म की पाठशाला है जहां कितने ही प्रशिक्षक निस्वार्थ भाव से ज्ञानार्थियों को धर्म की शिक्षा और संस्कार की शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। इसके कुशल संचालन में प्रशिक्षक, व्यवस्थापक और ज्ञानार्थियों तीनों का संतुलन होना चाहिए।

SAJJAN NIWAS

तेरापंथी सभा का एक तेरापंथ भवन जो सज्जन निवास के  नाम से जाना जाता है।  पुरानी लेन स्थित चोपड़ा गली में अवस्थित है।  वर्षों तक तेरापंथी सभा का कार्यालय संचालित होता रहा है।  यह भवन सभा की गतिविधियों का केन्द्र  बिन्दु भी रहा है।  चरित्रात्माओं के विराजने के अलावा सभा के  शैक्षणिक कार्य  के रूप में भी काम आता रहा है। संस्कार केन्द्र , ज्ञानशाला,  कोचिंग क्लासेज का भी व्यवस्थित संचालन इस भवन में  होता रहा है। धार्मिक कार्यों के साथ सामाजिक कार्यों को पूरा करने की दृष्टि  विवाह-शादियों  अन्य  मांगलिक अवसरों पर न्युनतम शुल्क पर भवन का उपयोग हो रहा है जिससे सभा की कुछ आय भी बढ़ी है तथा सभा के सामाजिक  दायित्व को पूरा करने में मील का पत्थर साबित हुआ। तेरापंथी सभा को इस भवन का आधा हिस्सा स्वर्गीय ईश्वरचन्द जी चोपड़ा की स्मृति में उनके पुत्र तोलाराम चोपड़ा  ने  भेंट किया ।  भवन का समय समय पर नवीनीकरण होता रहा अभी दस कमरे  व दो हॉल , रसोईघर इत्यादि सभी बने हुए है।  सभी कमरे व हॉल वातुनुकूलित है।